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A nice poem on Holi: festival of colors

घुल रही फिजा में रंगो की महक पागल मन क्यूँ बार बार जाता है बहक तोड़कर हर बंधन को दूर कहीं छोड़कर व्यथित वेदना को भूलकर हर इक पीड़ा मन रंग की आगोश में गिरा रंग है प्यार का , सौहार्द का आनंद का, उल्लास का अनेकता में भी एकता संपूर्ण भारत के इस विश्वास का इस रंग में न जाने क्या जादू है कि मन मेरा बेकाबू है कितने ही टूटे रिश्तों की डोर बाँधती रंग में इतनी है असीम शक्ति मन मेरे डूबकर आज इस रंग में कर ले यह निश्चय कि हम अपनी रंगभूमि को प्यार और भाईचारे से और रंगीन बनाएँगे और हर होली में हर बार हम यही संकल्प दुहराएँगे By Shiv Nath Kumar , CDAC, Mumbai